जीवन में रामायण की प्रासंगिकता

शिक्षा: जीवन में रामायण की प्रासंगिकता: यहाँ दो आकृतियां बनी हैं जिनमे से एक वर्गाकार है और दूसरी त्रिभुजाकार। सवाल यह है कि इनमें से एक नर है और एक मादा।

जवाब आपके मन में आ चुका है कि कौन सी आकृति नर है और कौन सी मादा। जबकि इन आकृतियों में लिंग निर्धारण करने का कोई वैज्ञानिक आधार उपलब्ध नही था फिर भी आपके मन में से एक जवाब आपको मिला।

दरअसल हमारा जो सबकॉन्शियस ब्रेन (Subconscious Mind) यानि अवचेतन मन है वो ऐसे सवालों के जवाब हमे लाकर देता है, जहाँ हमारा चेतन मन हाथ खड़े कर देता है। वो जवाब आता है व्यक्ति के द्वारा अपने जीवन मे सुनी हुई घटनाओं, सुने हुए एक दूसरे के अनुभवों और पढ़े हुए किस्से कहानियों , संगति से।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले साथी इस प्रक्रिया को ट्रेनिंग कहते हैं जिसमे सर्वर में पुराना डेटा लोड किया जाता है, जिसके आधार पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम आगे काम करता है।

मतलब अच्छा गुणवत्ता वाला संस्कारी डेटा भरेंगे तो सिस्टम हर अड़चन से निकल जायेगा और बेस्ट परफॉर्मेंस देगा।

आधुनिक साइकोलॉजी विज्ञान की इस गूढ़ तकनीक को हमारे पूर्वज बेहतर से जानते थे और इसका प्रैक्टिकल आस्पेक्ट उन्होंने विकसित किया था, जिसका नतीजा था पूरा समाज संस्कारी था और सांस्कृतिक रूप से एकता में बंधा था।

पूर्वज करते थे कथा वाचन तकनीक का इस्तेमाल

आज किसी बच्चे से आप कहिये के बेटा फ्रिज मत खोलना आप वहां से हट जाइये बच्चा सबसे पहले फ्रिज ही खोल कर देखेगा। छोटे छोटे बच्चों का मन बेहद जिज्ञासु और ग्रहणशील होता है उनके अवचेतन मन में पॉजिटिव इनफार्मेशन रजिस्ट्रियां कोड करने के लिए हमारे पूर्वजों के तकनीक बनाई जिसका नाम था कथा वाचन।

रामायण में भगवान राम की कहानी एक जीवंत कहानी है जिसमे मानवीय संबधों , दायित्वों, के अनेकों अनेकों उदहारण आते हैं जो बच्चों के कोमल मन मे बैठ जाते हैं।

जब कभी भी उनके जीवन मे कोई सिमिलर सिचुएशन आती है तो अवचेतन मन वहीं से सलूशन तलाश कर दे देता है और व्यक्ति वैसा ही आचरण करता है जैसा उसके सामने बेंचमार्क बना हुआ होता है।

भारत की धरती से कुछ लोगों को मारिशस और फिजी जैसी दूर जगहों पर प्रायोगिक तौर पर अंग्रेजों ने बसाया था, लोग अपने साथ रामचरित मानस और रामायण लेकर गए और कठिनतम समय को उन्होंने हंस गा कर संतुष्टि से काट लिया।

उनकी आज की पीढ़ी भी भारतीय संस्कृति से जुड़ाव महूसस करती है। जो अलगाव नज़र आता है वो सतही है जैसे ही कोई संकट खड़ा होगा असल रंग अंदर से निकल कर बाहर आ जाएगा।

दूरदर्शन पर फिर से शुरू हुआ रामायण का प्रसारण

33 वर्ष पूर्व बन्द किये गए रामायण सीरियल को जैसे ही दूरदर्शन पर आज चालू करने का ऐलान हुआ तो भारतीय समाज के वैचारिक प्रयोगकर्मी अपने अपने बिलों से निकल आए और रुदन क्रंदन चालू कर दिया है।

https://twitter.com/hadiyashafin/status/1243464891203088384

वैचारिक प्रयोगकर्मियों से हाथ जोड़ कर निवेदन है कि आँखें खोल लें, कुछ लिख पढ़ लें, सत्य अब अपने गुणों के कारण उभर कर जगत में ऊपर अपने आप आ रहा है। तुम्हारे प्रपंच अब नही चलेंगे।

क्योंकि विज्ञान विज्ञान चिल्लाने से कुछ नही होने वाला जब तक उसका रेगूलेटर विवेक हमारे पास नही होगा। विवेक को विज्ञान की तरह न सिखाया जा सकता है और न तकनीक की तरह हस्तांतरित,इसे केवल जागृत किया जा सकता है।

वर्ग और त्रिभुज की आकृतियों से अवचतेन मन की कार्यप्रणाली को पकडने की तकनीक गुरुग्राम के प्रसिद्ध साइकोलॉजिस्ट और मास्टर ट्रेनर Vikas Vats भाई साहब ने मुझे 15 वर्ष पूर्व सिखाई थी। इस तकनीक को मैने अपने अनेक ट्रेनिंग सेशंस में प्रयोग किया है और शत प्रतिशत रिजल्ट मिला है।

Post Credit: यह पोस्ट हमने facebook यूजर कमल जीत के प्रोफाइल से कॉपी-पेस्ट की है .

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